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क्या दवा माफियाओं पर सरकार कसेगी नकेल..?

दवा कंपनियों के लिए बने नियम या मौत का लाइसेंस?

‼️दवा कंपनियों के लिए बने नियम या मौत का लाइसेंस?‼️

नक़ली दवाओं पर कुछ दिन पहले लिखे ब्लॉग पर माफियाओं के लिए सकारात्मक रवैया।

ब्लॉगर ✒️सुरेन्द्र चतुर्वेदी………

राजस्थान में नक़ली दवाओं के काले कारोबार पर कुछ दिनों पहले मैंने ब्लॉग लिखा। सोचा कि सरकार माफियाओं की नाक में नकेल कसेगी मगर आज के अख़बारों में तो मामला ही उल्ट गया है। कैसे ये भी जान लें!

देश में जब दवाइयों पर लोगों का भरोसा ही टूटने लगे, तब सबसे बड़ा सवाल उठता है कि आखिर जनस्वास्थ्य की सुरक्षा किसके हाथों में है❓हाल ही में सामने आए खुलासे ने यह चिंता और गहरी कर दी है कि स्वास्थ्य विभाग ने ऐसा नया नियम बना दिया है, जिसके तहत अगर किसी दवा में उसका ज़रूरी सॉल्ट शून्य भी हो, तो भी उस दवा को “नक़ली” नहीं माना जाएगा।

सोचिए, डायबिटीज़ की दवा हो और उसमें मेटफॉर्मिन नाम का सॉल्ट ही न मिले, एंटीबायोटिक हो और उसमें संक्रमण से लड़ने वाला तत्व ही ग़ायब हो—तो फिर वह दवा किस काम की❓यह सिर्फ दवा नहीं, बल्कि मौत का परोसा हुआ पैकेट है।

इस बारे में जब मैंने जांच पड़ताल की तो सवाल उठा कि नियम क्यों बदला गया

और दोस्तों। यह सवाल टालना मुश्किल है। विधानसभा और लोकसभा में अलग-अलग जवाब देकर विभाग ने पहले ही संदेह पैदा कर दिया था। एक जगह 36 दवाएँ नक़ली बताई गईं, दूसरी जगह वही संख्या 55 निकली। बाद में बनी समिति ने पाया कि “नक़ली दवा” की परिभाषा बदलकर कंपनियों को बचाया गया। साफ़ है कि यह नियम मरीजों के हित में नहीं, बल्कि दवा कंपनियों की सुरक्षा के लिए गढ़ा गया है।इस नियम से माफियाओं की कंपनियों को फ़ायदा और मरीजों को धोखा दिया जा रहा है।

इस चालाक़ नई परिभाषा का नतीजा यह हुआ कि 26 जुलाई 2023 को मेटफॉर्मिन हाइड्रोक्लोराइड गायब होने के बावजूद कंपनी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

विगत 19 सितंबर 2023 को 625 एंटीबायोटिक कैप्सूल बिना सॉल्ट मिले, फिर भी दोषी कोई नहीं ठहरा।

इसी तरह 11 मार्च 2024 को पैंटोप्राजोल सॉल्ट गायब मिला, मामला दबा दिया गया।

और फिर 6 जनवरी 2024 को एलर्जी की दवा रूपाटाडीन बेअसर निकली, फिर भी कंपनियाँ बेख़ौफ़ बैठी हैं। तो क्या माफियाओं से सरकार मिली हुई है

हर मामले में कंपनियाँ बच निकलीं, लेकिन मरीजों ने क्या खोया❓अपनी सेहत, अपनी उम्मीद और शायद अपनी जान।

मित्रों। यह सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं बल्कि नैतिक दिवालियापन है।

स्वास्थ्य विभाग यह कहकर बचाव करता है कि दवा में अगर कोई एक भी घटक मौजूद है तो उसे नकली नहीं कहा जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि मरीज दवा क्यों खाता है❓किसी एक घटक के लिए या मुख्य सॉल्ट के असर के लिए❓

यह तर्क वैसा ही है जैसे कोई कहे—कार में इंजन न हो, लेकिन चूँकि टायर हैं, इसलिए उसे गाड़ी मान लिया जाए।

सरकार की इस चालाकी के विरुद्ध जनता को जागना होगा। यह नियम कंपनियों के मुनाफे का सुरक्षा कवच है और मरीजों की जान पर खुला वारंट। यहां मेरा साफ़ मानना है कि इसके लिए संसद और विधानसभाओं में सीधी बहस हो। स्वास्थ्य मंत्रालय और नियामक एजेंसियाँ स्वतंत्र होकर जांच करें। मरीज संगठन और उपभोक्ता फोरम्स अदालत का दरवाज़ा खटखटाएं।

दवा कंपनियों को बचाने वाला यह नियम दरअसल मौत को वैधता देने जैसा है। यह जनता के स्वास्थ्य के साथ खुला विश्वासघात है। अगर आज इसे रोका नहीं गया, तो कल कोई भी कंपनी बिना सॉल्ट वाली “दवा” बनाकर मुनाफा कमाएगी और मरीजों के लिए अस्पताल से कब्र तक का सफ़र छोटा कर देगी।

(उक्त लेख प्रसिद्ध लेखक और ब्लॉगर सुरेन्द्र चतुर्वेदीजी द्वारा लिखित है) ✒️

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