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सत्ता के “अहंकार” को चुनौती देती, कलमकारों की ‘हुंकार’

सत्ता के “अहंकार” को चुनौती देती, कलमकारों की ‘हुंकार’

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, लेकिन सत्ता ने सिखा दिया है सच से आंखें फेर लेना !

आकाश शर्मा। जयपुर, राजस्थान। प्रदेश की राजनीति के गलियारों में इन दिनों एक ऐसी ‘सन्नाटे’ वाली खामोशी पसरी है, जो किसी सामान्य शांति का प्रतीक नहीं, बल्कि एक बड़े सियासी और सामाजिक तूफान के आने की आहट है। यह खामोशी उस तंत्र की है जो बहरा होने का स्वांग रच रहा है। एक तरफ सत्ता के शीर्ष पर बैठे ‘अधिपति’ अपने सरकारी बंगलों और आलीशान महलों की चकाचौंध में इस कदर मशगूल हैं कि उन्हें लोकतंत्र की मर्यादाएं धुंधली दिखाई देने लगी हैं। विलासिता और सत्ता के मद में डूबे ये ‘आधुनिक राजा’ शायद यह भूल गए हैं कि जिस सिंहासन पर वे विराजमान हैं, उसकी नींव जनता के भरोसे और सच की आवाज पर टिकी है।

दूसरी ओर, लोकतंत्र का वह ‘चौथा स्तंभ’ जिसे समाज का दर्पण कहा जाता है, आज उसी दर्पण को बचाने के लिए सड़कों की खाक छान रहा है। जिन कलमकारों की उंगलियों से निकलने वाली स्याही ने कभी व्यवस्थाओं को दुरुस्त किया था, आज वही हाथ न्याय की आस में तपती सड़कों पर ‘सत्याग्रह’ के लिए मजबूर हैं। ये कलम के सिपाही धूल, धुएं और चिलचिलाती धूप के बीच बैठकर किसी अहसान की भीख नहीं, बल्कि अपने उस लोकतांत्रिक हक और सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं जिसे छीनने का कुत्सित प्रयास सत्ता के गलियारों से हो रहा है।

यह दृश्य किसी त्रासदी से कम नहीं है कि जहाँ एक ओर नीति-निर्माता बंद कमरों में उत्सव मना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सच को जिंदा रखने वाले ‘कलमकार’ खुले आसमान के नीचे व्यवस्था की संवेदनहीनता की बलि चढ़ रहे हैं। सवाल अब सिर्फ एक मांग का नहीं है, सवाल उस अहंकार का है जो कलम की ताकत को नजरअंदाज करने की जुर्रत कर रहा है।

नींद में सरकार,सड़क पर ‘कलम’ का पहरा !

संवेदनहीनता की पराकाष्ठा देखिए कि जिन पत्रकारों की कलम की एक स्याही से सरकारें बदल जाती हैं, आज वही कलमकार धूल फांकने को मजबूर हैं। सरकार ने कानों में ऐसी ‘रुई’ ठूंस ली है कि उसे न तो इन पत्रकारों की आवाज सुनाई दे रही है और न ही उनका दर्द दिखाई दे रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या सत्ता की कुर्सी इतनी ऊंची हो गई है कि नीचे बैठा सच लिखने वाला इंसान अब नजर ही नहीं आता?

इंद्र और पवन देव की परीक्षा पर ‘अडिग’ हैं योद्धा !

कुदरत का आलम यह है कि आसमान से कभी आग बरस रही है, तो कभी इंद्र देव और पवन देव अपनी प्रचंड आंधी-तूफानों से इन कलमकारों की परीक्षा ले रहे हैं। शायद नियति भी यह देख रही है कि ये भीड़ सच में हार मानती है या नहीं। लेकिन ये कोई आम भीड़ नहीं है; ये वो ‘जिद’ है जो इतिहास लिखने का दम रखती है। प्रकृति भी शायद थक जाए, लेकिन न्याय की आस में बैठे इन योद्धाओं के हौसले नहीं डिगेंगे।

आसमान जाग रहा है, राजा सो रहा है !

यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा उपहास है कि कलमकारों के हक के लिए प्रकृति (आंधी और तूफान) संकेत दे रही है, लेकिन जमीन पर बैठा ‘राजा’ अज्ञानता के गहरे अंधेरे में डूबा है। सत्ता के अहंकार में डूबी इस सरकार को शायद इस बात का इल्म नहीं कि “कलम की नोक जब सच लिखती है, तो सिंहासन डोलने लगते हैं।”

न झुकेगी न रुकेगी, कलम अब हक लेकर रहेगी !

सरकार कान खोलकर सुन ले हालात चाहे जितने भी बदतर हों, सूरज आग उगले या आसमान टूट पड़े, ये कलमकार डटे रहेंगे। यह लड़ाई अब सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस सच की है जिसे दबाने की हर कोशिश नाकाम होगी । जब तक न्याय की मुहर नहीं लगेगी, तब तक न ये धरना खत्म होगा और न ही ये कलम रुकेगी। अब देखना यह है कि सत्ता के अहंकार की दीवार कब गिरती है और ‘राजा’ की आंखें कब खुलती हैं…???

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