
सत्ता के गलियारों में पत्रकारों का ‘इकोनॉमिक एनकाउंटर‘
अब कलम नहीं, ‘किचन’ पर हमला !
आकाश शर्मा, जयपुर /राजस्थान। गुलाबी नगरी की फिजाओं में इन दिनों लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की ‘हत्या’ का एक ऐसा खौफनाक और अदृश्य तरीका अपनाया जा रहा है, जिसकी आहट तक सुनाई नहीं देती। अब यहाँ पत्रकारों को चुप कराने के लिए न तो जेल की काल कोठरी की ज़रूरत पड़ती है और न ही सरेआम धमकियों की। अहंकारी राजनेताओं और निरंकुश नौकरशाहों के नापाक गठजोड़ ने ‘आर्थिक नरसंहार’ का एक ऐसा सफल और घातक प्रयोग शुरू किया है, जिसने कलम के सिपाहियों को उनके ही घरों में ‘जीते जी मारना’ शुरू कर दिया है। यह हमला शारीरिक नहीं, बल्कि अस्तित्व पर है। यह प्रहार पीठ पर नहीं, बल्कि पत्रकार के ‘चूल्हे’ पर है। मारपीट में शरीर पर नील के निशान गवाही देते हैं, गोलियों की आवाज़ें चीख बनकर गूँजती हैं, और मुकदमों की फाइलें सबूत बनती हैं; लेकिन जब सत्ता की हनक से किसी पत्रकार की रोजी-रोटी का गला घोंटा जाता है, तो वह बिना शोर किए दम तोड़ देता है। यह एक ऐसा ‘सफेदपोश अपराध’ है जहाँ कातिल भी सामने है और हथियार भी साफ है, लेकिन बिरादरी की कायरता और व्यवस्था की बेशर्मी ने इसे “निजी मामला” करार देकर रफा-दफा करने का लाइसेंस भी दे दिया है।

न वार, न प्रहार, सीधा व्यापार पर प्रहार !
पिछले कुछ समय से जयपुर के रसूखदार राजनेताओं और अहंकारी अधिकारियों के गठजोड़ ने एक खतरनाक ‘इकोनॉमिक अटैक’ मॉडल तैयार किया है। इस षडयंत्र के तहत सच लिखने वाले पत्रकारों के विज्ञापनों और भुगतान पर अघोषित रोक लगा दी जाती है। मीडिया संस्थानों के मालिकों पर दबाव बनाकर पत्रकारों को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाया जाता है। हद तो यह है कि पत्रकार के परिवार के सदस्यों के छोटे-मोटे व्यवसायों तक को प्रशासनिक शक्तियों के जरिए निशाना बनाया जाता है। इसे बड़ी सफाई से “निजी विवाद” या “प्रोफेशनल फैसला” बताकर शासन-प्रशासन पल्ला झाड़ लेता है।
बिरादरी की खामोश गद्दारी !
इस पूरे खेल का सबसे वीभत्स पहलू तब सामने आता है जब कोई पत्रकार इस आर्थिक प्रताड़ना का शिकार होता है। बिरादरी के ही अन्य साथी इसे “व्यक्तिगत मामला” कहकर किनारा कर लेते हैं। आलम यह है कि कुछ साथी, पत्रकार की इस व्यथा पर खबर चलाना तो दूर, सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डालने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते। ऊपर से मिले ‘इशारों’ ने कलम की धार को कुंद कर दिया है। याद रखिए, जो आज मूकदर्शक हैं, कल वे भी इसी शिकारगाह का हिस्सा होंगे।
आँखें मूँदने से मौत नहीं टलती !
कहावत है कि “कबूतर के आँखें बंद कर लेने से बिल्ली शिकार करना बंद नहीं करती।” आज जयपुर की पत्रकार बिरादरी उसी कबूतर की भूमिका में है। उन्हें भ्रम है कि चुप रहकर वे सुरक्षित हैं, जबकि हकीकत में ‘शिकारी’ की फितरत ही शिकार करना है। आज कोई और है, कल आपका नंबर होगा। जयपुर के सत्ता केंद्रों से निकलने वाले एक छोटे से ‘इशारे’ ने आज ईमानदार कलम को भुखमरी की दहलीज पर ला खड़ा किया है।
“कलम की ताकत पर अब तिजोरी का पहरा है”
यह हमला सिर्फ एक पत्रकार पर नहीं, बल्कि उस हर आवाज़ पर है जो व्यवस्था से सवाल पूछने का साहस रखती है। समय आ गया है कि आँखें खोली जाएं, वरना यह ‘सफल प्रयोग’ एक दिन पूरी पत्रकारिता को ही इतिहास बना देगा।”




