चित्तौड़गढ़ में हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के प्रस्तावित फर्टिलाइज़र प्लांट पर बढ़ा विवाद, बिना NOC खाद प्लांट का निर्माण क्यों..?, शिकायतों और ज्ञापनों के बाद कार्यवाही क्यों नहीं..?
चित्तौड़गढ़, राजस्थान। जिले के पुठोली पंचायत क्षेत्र में प्रस्तावित हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के फर्टिलाइज़र प्लांट को लेकर विवाद अब गंभीर जनआंदोलन का रूप ले चुका है। पर्यावरणीय स्वीकृति, जनसुनवाई की पारदर्शिता और संभावित प्रदूषण को लेकर ग्रामीणों का विरोध लगातार तीव्र होता जा रहा है। सोमवार को लगभग 25 गांवों के ग्रामीणों ने जिला कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा और परियोजना को तत्काल निरस्त करने की मांग की।

अवैध निर्माण और भूमि पूजन विवाद
ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी ने पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त किए बिना ही गुपचुप तरीके से फर्टिलाइज़र प्लांट का लगभग 70 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा कर लिया।
आरोप यह भी है कि इस अवैध निर्माण के बावजूद जिंक प्रबंधन ने राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को बिना वास्तविक स्थिति से अवगत कराए 12 दिसंबर को प्रस्तावित भूमि पूजन कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया।
हालांकि मामला मीडिया में उजागर होने के बाद यह कार्यक्रम निरस्त करना पड़ा, जिससे पूरे प्रकरण पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
जनसुनवाई पर उठे गंभीर प्रश्न
विवाद की शुरुआत 10 मार्च को आयोजित जनसुनवाई से हुई, जिसे ग्रामीणों ने पूरी तरह निष्पक्ष न होने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि:-
उनकी आपत्तियों को व्यवस्थित रूप से नजरअंदाज किया गया।
परियोजना का बड़ा हिस्सा पहले ही तैयार कर लिया गया था।
पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में तथ्यात्मक विसंगतियां हैं
ग्रामीणों के अनुसार यह जनसुनवाई महज औपचारिकता बनकर रह गई, जिसके चलते इसे निरस्त करने की मांग की जा रही है।
आंदोलन की क्रमिक तीव्रता 18 मार्च: जनसुनवाई के विरोध में जिला कलेक्टर को ज्ञापन।
2 अप्रैल (हनुमान जयंती): विरोध प्रदर्शन, पुतला दहन और पर्यावरण विभाग को ज्ञापन।
11 अप्रैल: 25 गांवों के ग्रामीणों का कलेक्ट्रेट पर उग्र प्रदर्शन, राज्य और केंद्र सरकार को ज्ञापन।
ग्रामीणों ने प्रशासन को 7 दिन का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी है कि उचित कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन व्यापक और अनिश्चितकालीन होगा।
बिना अनुमति निर्माण के लगे आरोप
प्रदर्शनकारियों पीड़ित ग्रामीणों का कहना है कि:
निर्माण कार्य बिना पर्यावरणीय स्वीकृति के जारी है।
राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल की अनुमति नहीं ली गई है।
यह पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 का स्पष्ट उल्लंघन है।
उन्होंने तत्काल निरीक्षण, निर्माण कार्य पर रोक और अवैध संरचनाओं को हटाने की मांग की है।

“प्रदूषण और स्वास्थ्य को लेकर भय”
ग्रामीणों ने क्षेत्र में पहले से मौजूद औद्योगिक प्रदूषण का हवाला देते हुए गंभीर चिंताएं जताई हैं:
कई जल स्रोत पीने योग्य नहीं रहे।
कृषि भूमि बंजर होती जा रही है।
पशुओं की मौत और बीमारियों में वृद्धि।
कैंसर, त्वचा और श्वास संबंधी रोगों में बढ़ोतरी।
ग्रामीणों ने आशंका जताई कि नया प्लांट स्थिति को और गंभीर बना सकता है।
“विकास नहीं, सुरक्षित जीवन चाहिए”
कंपनी जहां इस परियोजना को रोजगार और कृषि विकास के लिए लाभकारी बता रही है, वहीं ग्रामीण इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि यह प्लांट शुरू हुआ तो चित्तौड़गढ़ की स्थिति पंजाब के भटिंडा जैसी हो सकती है, जहां से “कैंसर ट्रेन” के रूप में मरीजों को इलाज के लिए दिल्ली भेजा जाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई तो सरकार को चित्तौड़गढ़ से भी “कैंसर ट्रेन” चलानी पड़ेगी। भविष्य में भोपाल त्रासदी से भी भीषण गंभीर त्रासदी यहां हो सकती है।
सीएसआर और स्थानीय उपेक्षा पर सवाल
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि:
कंपनी क्षेत्र को प्रदूषण दे रही है।
जबकि विकास के नाम पर मिलने वाला सीएसआर फंड अन्य जिलों और राजधानी में खर्च किया जा रहा है।
उन्होंने इसे स्थानीय जनता के साथ अन्याय बताया।
प्रमुख मांगें
ग्रामीणों द्वारा दिए गए ज्ञापन में निम्न मांगें शामिल हैं:
निर्माण स्थल का तत्काल निरीक्षण।
अवैध निर्माण कार्य पर रोक और ध्वस्तीकरण।
जनसुनवाई को निरस्त कर निष्पक्ष जांच।
पर्यावरणीय क्षति का आकलन और प्रतिकर।
प्लांट की स्वीकृति रद्द।
पशु मृत्यु की वैज्ञानिक जांच।
ग्रीन बेल्ट की स्वतंत्र जांच और रिपोर्ट सार्वजनिक करना।
कानूनी और प्रशासनिक पहलू
विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी औद्योगिक परियोजना में:
पर्यावरण प्रभाव आकलन
जनसुनवाई
अंतिम स्वीकृति
—इन प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य है। ऐसे मामलों में राष्ट्रीय हरित अधिकरण भी हस्तक्षेप कर सकता है।
बड़ा सवाल
चित्तौड़गढ़ का यह विवाद एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रश्न खड़ा करता है—
क्या औद्योगिक विकास के नाम पर पर्यावरणीय नियमों और स्थानीय समुदाय के अधिकारों की अनदेखी की जा सकती है?
अब नजरें प्रशासन, राज्य सरकार और केंद्र सरकार पर टिकी हैं कि वे इस मामले में पारदर्शी और न्यायपूर्ण निर्णय लेकर प्रभावित ग्रामीणों को राहत दिलाते हैं या नहीं।




