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जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते शिक्षा के ‘ठेकेदार’: अपराध ‘व्यक्तिगत’ तो संस्थान किसका?

जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते शिक्षा के ‘ठेकेदार’: अपराध ‘व्यक्तिगत’ तो संस्थान किसका?

चित्तौड़गढ़, राजस्थान। मेवाड़ यूनिवर्सिटी में चल रहे फर्जी डिग्री और प्रशासनिक अनियमितताओं के खेल पर जब सरकार ने नए प्रवेशों पर पूर्ण रोक लगाई, तो संस्थान के चेयरमैन अशोक गदिया का एक बेहद ही ‘अजीबोगरीब’ और गैर-जिम्मेदाराना बयान सामने आया कि यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी ने अपने स्तर पर कुछ गलत किया है, तो वह उसका “व्यक्तिगत अपराध” है, इसमें संस्थान का कोई लेना-देना नहीं है!

गदिया साहब के इस हास्यास्पद तर्क पर कुछ बुनियादी सवाल लाजमी हैं:
1. ‘व्यक्तिगत अपराध’ का मुखौटा और सिंडिकेट का खेल
जब यूनिवर्सिटी की लेटरहेड, सील, और आधिकारिक सिस्टम का उपयोग करके थोक के भाव में ‘फर्जी डिग्रियां’ बांटी जा रही हों, तो उसे “व्यक्तिगत अपराध” कहकर पल्ला कैसे झाड़ा जा सकता है? खबरों के मुताबिक, इस पूरे मामले में यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रेसिडेंट कौशल किशोर चंदुल और पूर्व डीन कीर्ति शर्मा जैसे शीर्ष पदों पर बैठे लोग गिरफ्तार हो चुके हैं। क्या गदिया जी यह कहना चाहते हैं कि यूनिवर्सिटी के चांसलर, वाइस-चांसलर और डीन जैसे शीर्ष अधिकारी संस्थान से इतर, अपने घरों में बैठकर व्यक्तिगत रूप से डिग्रियां छाप रहे थे?

व्यवस्था की विफलता को व्यक्तिगत बताना कहां तक तर्कसंगत?
किसी भी शैक्षणिक संस्थान में कोई भी प्रशासनिक काम ‘व्यक्तिगत’ नहीं होता। अगर किसी संस्थान का सिस्टम इतना कमजोर या मिलाभगत से भरा है कि वहां एसओजी (SOG) को दखल देना पड़ रहा है और अधिकारियों को जेल हो रही है। मुनाफा और रसूख ‘संस्थान’ के खाते में जाता है, तो वहां होने वाले पाप और भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी ‘व्यक्तिगत’ कैसे हो सकती है?
मीडिया ने अपनी पूर्व खबरों ने इसे एक सुनियोजित सिंडिकेट का खेल बताया है, जो गदिया जी के ‘व्यक्तिगत भूल’ वाले दावों को पूरी तरह खारिज करता है।

छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ पर चुप्पी
संस्थान के भीतर नियमों की धज्जियां उड़ती रहीं, कृषि से लेकर नर्सिंग और पीएचडी कोर्सेज तक में बिना अनुमति और बिना मानकों के खेल होता रहा, लेकिन प्रबंधन आंखें मूंदे बैठा रहा। आज जब सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए नए दाखिलों पर रोक लगा दी है, तो कोर्ट जाने की धमकी देकर खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश की जा रही है।

चेयरमैन का यह बयान केवल और केवल अपनी कानूनी व नैतिक जिम्मेदारी से भागने का एक हताश प्रयास है। शिक्षा के मंदिर को ‘डिग्री छापने का कारखाना’ बना देने के बाद, इसे चंद कर्मचारियों का “व्यक्तिगत अपराध” बताकर मेवाड़ यूनिवर्सिटी का प्रबंधन खुद को पाक-साफ साबित नहीं कर सकता। अब समय आ गया है कि इस ‘काले साम्राज्य’ के पीछे बैठे असली सफेदपोश चेहरों से भी नकाब हटे।

रिपोर्टर: राजेन्द्र सिंह शेखावत

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